15 March, 2026
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सम्पादकीय मीडिया की धूमिल होती छवि किसी भी लोकतांत्रिक देश में देश की लोकतन्त्र व्यवस्था को चुस्त दुरूस्त बनाये रखने में मीडिया की अहम भूमिका होती है। मीडिया देश के किसी भी कोने में होने वाले बड़े से बड़े और छोटे से छोटे अत्याचार, उत्पीड़न, व अन्य समस्याओं को जनता के सामने पेश कर देता है। इस प्रकार मीडिया देश की सरकार को आईना दिखाने का कार्य करता है। सरकार उसी आईने में अपनी सही तस्वीर देखकर अपनी कार्य प्रणाली में कभी बदलाव करके कभी उसमें कुछ संशोधन करके उचित निर्णयों के द्वारा स्थिति को संभालने का प्रयास करती है। भारत की स्वतंत्रता से कई दशकों तक का इतिहास इस बात का गवाह है कि भारतीय मीडिया ने हमेशा निष्पक्षता से देश हित की बात जनता के सामने रखी वह चाहे उस समय की वर्तमान सरकार के समर्थन में हो या विरोध में हो। 1977 में प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी की कांग्रेस सरकार में इमरजेंसी काल में कड़े प्रतिबन्धों के बावजूद उस समय के भारतीय मीडिया ने अपना कर्तव्य निभाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी। यानि मीडिया न तो सरकार की शक्ति से भयभीत हो सकता है, न ही सरकार की मोह माया में फंसकर अपनी गरिमा को बेच सकता है। यही एक सेकुलर देश के सच्चे, ईमानदार और निष्पक्ष मीडिया की पहचान रही है। लेकिन इधर लगभग एक दशक से मीडिया की यह छवि दिन प्रतिदिन धूमिल होती जा रही है। आज स्थित यहां तक पहुंच गयी है कि ऐसा आभास होता है कि कुछ समाचार पत्रों और टीवी चैनलों को छोड़कर सारे चैनलों और समाचार पत्रों ने अपनी निजी स्वतंत्रता को सरकार के हवाले कर दिया है। समाचार पत्रों में वही खबरें और लेख प्रकाशित हो रहे हैं जो सरकार के समर्थन में हो, टीवी चैनलों पर वही दिखाया जा रहा है जो सरकार दिखावाना चाहती है। कभी-कभी कुछ छुट पुट घटनाओं को जिसमें सरकार की खामी उजागर होती है, उसे दिखा दिया जाता है और समाचार पत्रों में कहीं अन्दर के पृष्ठों में छाप दिया जाता है, जिससे यह भी जाहिर होता रहे कि हम लोकतान्त्रित व्यव्यस्था के हामी हैं, पूरी निष्पक्षता बरतते हैं। यह जनता की आंख में धूल झोंकने के अलावा कुछ नहीं है। आज हालत यह हो गयी है कि ऐसे वरिष्ठ पत्रकार और एंकर जिनका नाम ही किसी खबर की सच्चाई के लिए काफी होता था। वह सरकार के सुर में सुर मिलाकर बात करते नजर आते हैं। महत्वपूर्ण मुद्दों को छोड़कर फिल्मी जगत में होने वाली पार्टियों की रंग रेलियां बयान करते हैं। फिल्मी हीरोईन कंगना ने क्या कहा, क्या खाया, क्या पहना कहां सोई जैसी घटिया जानकारी जनता को परोसने में लगा मीडिया कोरोना काल में देश के नवजवानों में बढ़ती बेरोजगारी, चरमराई अर्थ व्यव्यवस्था, आसमान छूती मंहगाई, वर्तमान बिगड़ी हुई शिक्षा व्यवस्था, जैसे महत्वपूर्ण विषयों को छोड़कर सरकार के द्वारा जनता को केवल सुनहरे सपने दिखाने का कार्य करने में लगा है। प्रश्न यह उठता है कि जनता को केवल सपने दिखाकर और उसका ध्यान बांटने के लिए अनावश्यक मुद्दो को दिखाकर क्या मीडिया अपने दायित्वों को पूरा कर लेगा। यदि इसका उत्तर नकारात्मक है तो इसमें सुधार कब होगा? और यदि उत्तर सकारात्मक है तो गांधी का यह देश आने वाले वर्षों में कहाँ खड़ा होगा? सुनील कुमार यादव

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